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राखीगढ़ी में ASI ने शुरू की तीन साल की लंबी खुदाई, हड़प्पा के 5000 साल पुराने रहस्यों से उठेगा पर्दा

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टीलों के बाहरी किनारों पर खोदाई से खुलेंगे हड़प्पा सभ्यता के राज (फोटो: जागरण)



सुनील मान, नारनौंद। आइकानिक साइट राखीगढ़ी में एक बार फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय ग्रेटर नोएडा द्वारा खोदाई का कार्य वीरवार से शुरू होगा। जिसका विभाग के महानिदेशक वाईएस रावत शुभारंभ करेंगे। अबकी बार सभी टीलों के किनारों पर खोदाई की योजना पर कार्य हो रहा है, ताकि पता चल सके की उन लोगों के बाहरी क्षेत्र का ढांचा कैसा होता था। वह किस प्लान पर कार्य करते थे।

शहर या गांव की सुरक्षा को लेकर भी खोदाई अहम मानी जा रही है। खोदाई का कार्य तीन वर्ष तक चलने वाला है जोकि अलग-अलग सेशन में की जाएगी। खोदाई के लिए ग्रेटर नोएडा, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी और शिमला यूनिवर्सिटी के करीब 15 छात्र पहुंच चुके हैं।

हड़प्पाकालीन सभ्यता का ऐतिहासिक गांव राखीगढ़ी एक बार फिर खोदाई को लेकर चर्चित है। जब-जब यहां पर खोदाई हुई है अनेक ऐसे रहस्यों से पर्दा उठा है। जिसको जानने के लिए पूरी दुनिया बेताब रहती हैं। सातों टीलों पर अब तक अंदर के भाग पर ही खोदाई की गई है। अबकी बार इन टीलों के किनारों की सीमाओं पर खोदाई के लिए ट्रेंच बनाने का कार्य किया जा रहा है।

जिसको सर्वेयर डिफरेंशियल ग्लोबल पाजिशनिंग सिस्टम से तैयार कर रहे है। किनारों पर खोदाई करने से उन रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश की जाएगी कि उसे समय लोग गांव या शहर की बाहरी जमीन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करते होंगे। वह लोग अपनी रक्षा कैसे करते होंगे। सभी बातें अभी तक रहस्य ही बनी हुई है। जिनको आने वाले समय में खोदाई की परतों से खोला जाएगा।

वैसे तो खोदाई के लिए तीन वर्षों का लाइसेंस मिला है लेकिन बारिश और ज्यादा गर्मी होने पर खोदाई का कार्य बंद कर दिया जाता हैं ताकि बारिश से खोदाई के बाद निकले अवशेष नष्ट न हो जाएं। खोदाई की हुई पूरी साइट को पालिथीन लगाकर बंद किया जाता है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्खनन शाखा द्वितीय ग्रेटर नोएडा के उप अधीक्षण पुरातत्वविद भूपेंद्र सिंह फोनिया ने बताया कि अबकी बार टीलों के किनारों पर ट्रेंच लगाकर खोदाई की जाएगी। ताकि पता चल सके कि उसे सभ्यता के लोग किनारों पर किस चीज का प्रयोग करते थे। खोदाई के लिए तीन वर्षों का लाइसेंस मिला है जो की अलग-अलग सेशन में खोदाई की जाएगी। कुछ छात्र आ चुके हैं और जैसे ही खोदाई का कार्य शुरू होगा बाकी और भी छात्र आएंगे।

1997 में जब पहली बार खोदाई हुई थी तो इस बात पर मोहर लग गई थी कि ये पूरी दुनिया की सबसे बड़ी हड़प्पन साइट हैं। यह सभ्यता शुरू में ग्रामीण होती थी वो लोग पशु भी रखते थे। उसके बाद शहरी होने के भी प्रमाण मिल चुके हैं। हजारों साल पहले भी बड़े पैमाने पर उन लोगों का विदेशों से अलग अलग वस्तुओं का व्यापार भी होता था।

सबसे पहले गोलाकार आकार के मिट्टी से बने हुए मकान थे। उसके बाद करीब छह हजार साल पहले कच्ची ईंटों का प्रचलन शुरू हुआ और फिर उन्हें ईंटों को पकाकर पक्के मकान बनाने की शुरुआत हुई थी। मकान बनाने की तकनीक वैसे ही होती थी जैसा कि आज हम शहरी क्षेत्र में मकान बनाते हैं।

राखी गढ़ी में पहली बार खोदाई साल 1997 से 2000 तक भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर अमरेंद्र नाथ की अगुवाई में हुई थी। दूसरी बार डेक्कन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे ने साल 2003 से 2006 तक की थी। तीसरी बार भी प्रोफेसर वसंत शिंदे के नेतृत्व में वर्ष 2013 से 2016 तक अलग अलग टीलों पर की गई। उसके बाद 2020 से लगातार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग दिल्ली के संयुक्त महानिदेशक डा. संजय कुमार मंजुल के नेतृत्व में जून 2025 तक की गई।
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