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Thalassemia मुक्त झारखंड : 40 बच्चों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट होगा फ्री, सरकार उठाएगी 8 करोड़ का खर्च

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खासमहल सदर अस्‍पताल में मरीजों की जांच करते चिकित्‍सक।


जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। झारखंड के थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए नई शुरुआत हुई है। राज्य सरकार और निजी अस्पतालों की अनूठी साझेदारी के तहत अब बच्चों का बोन मैरो (अस्थि मज्जा) ट्रांसप्लांट निश्शुल्क किया जाएगा।    इस योजना के तहत प्रथम चरण में 40 बच्चों को जीवनदान देने का लक्ष्य रखा गया है। इसके उपचार का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।   
8 करोड़ का \“जीवनरक्षक\“ निवेश आमतौर पर एक बच्चे के बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर करीब 20 लाख रुपये का भारी-भरकम खर्च आता है, जो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए नामुमकिन होता है। सरकार ने इस बाधा को दूर करते हुए 8 करोड़ रुपये के बजट से इन बच्चों के इलाज का जिम्मा उठाया है।    इसे झारखंड को Thalassemia मुक्त बनाने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे जरूरतमंदों को काफी लाभ होगा।
सदर अस्पताल में विशेष शिविर का आयोजन

शनिवार को जमशेदपुर के सदर अस्पताल (खासमहल) में नारायणा हॉस्पिटल और ब्रह्मानंद नारायणा हॉस्पिटल के सहयोग से एक विशेष जांच एवं परामर्श शिविर का आयोजन किया गया। शिविर का शुभारंभ सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल और ब्रह्मानंद नारायणा हॉस्पिटल के निदेशक एके धर्मा राव ने संयुक्त रूप से किया।

शिविर में 52 बच्चों का परीक्षण किया गया, जिनमें से 40 बच्चों और उनके परिजनों का HLA (मानव ल्यूकोसाइट एंटीजन) टेस्ट निश्शुल्क कराया गया। यह टेस्ट यह तय करता है कि किस बच्चे को ट्रांसप्लांट के लिए डोनर मिल सकता है।
क्यों जरूरी है बोन मैरो ट्रांसप्लांट?

कोलकाता से आए वरिष्ठ रक्त रोग विशेषज्ञ डॉ. शिशिर कुमार पात्रा ने बताया कि Thalassemia एक अनुवांशिक बीमारी है। Bone marrow transplant ही इसका एकमात्र स्थायी इलाज है। यदि समय पर सही डोनर मिल जाए, तो बच्चा जीवन भर के लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन (रक्त चढ़ाने) की प्रक्रिया से मुक्त हो सकता है।   
रोकथाम पर विशेषज्ञों की सलाह

विशेषज्ञों ने जोर दिया कि इलाज के साथ-साथ रोकथाम भी जरूरी है। विवाह से पूर्व यदि युवक-युवती अपनी Thalassemia जांच करा लें, तो आने वाली पीढ़ी को इस गंभीर बीमारी से बचाया जा सकता है।

इस शिविर की सफलता में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) और जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र की टीम का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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