Tata steel का मिशन 2030 : घरेलू खदानों की लीज खत्म होने से पहले सुरक्षित किया भविष्य, कनाडा से शुरू हुआ आयात
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/10/article/image/tata-steel-1768047991711.jpgफाइल फाेटो।
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। भारत की दिग्गज इस्पात निर्माता कंपनी टाटा स्टील ने भविष्य की चुनौतियों को भांपते हुए अपनी रणनीतिक बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। वर्ष 2030 में कंपनी की प्रमुख घरेलू खदानों की लीज समाप्त होने वाली है, जिससे कच्चे माल (आयरन ओर) की आपूर्ति बाधित होने का खतरा मंडरा रहा है। इस संभावित संकट से निपटने और \“रॉ मैटेरियल सिक्योरिटी\“ सुनिश्चित करने के लिए कंपनी ने पहली बार अपनी कनाडाई सहायक कंपनी से लौह अयस्क का आयात शुरू किया है।
2030 की डेडलाइन: क्यों है चिंता का विषय
टाटा स्टील की इस बड़ी कवायद के पीछे मुख्य कारण भारत सरकार का खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम है। इस कानून के अनुसार, टाटा स्टील जैसी कंपनियों को आवंटित कैप्टिव खदानों (जो वे अपने प्लांट के उपयोग के लिए चलाती हैं) की लीज अवधि 31 मार्च 2030 को समाप्त हो जाएगी।
इस समय सीमा के दायरे में टाटा स्टील की जीवनरेखा मानी जाने वाली कई महत्वपूर्ण खदानें आ रही हैं: झारखंड: ऐतिहासिक नोवामुंडी लौह अयस्क खदान। ओडिशा: जोडा ईस्ट, काटामटी और खोंडबोंड जैसी हाई-यिल्ड खदानें।
लीज समाप्त होने के बाद इन खदानों की नए सिरे से नीलामी होगी। यदि नीलामी प्रक्रिया में देरी होती है या किसी कारणवश ये खदानें कंपनी के हाथ से निकलती हैं, तो जमशेदपुर और कलिंगानगर जैसे बड़े प्लांट में उत्पादन ठप होने की नौबत आ सकती है।
कनाडा से \“प्लान-बी\“ का सफल परीक्षण
अनिश्चितता के इस दौर में टाटा स्टील ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी \“टाटा स्टील मिनरल्स कनाडा\“ से आयरन ओर की एक बड़ी खेप मंगाकर ट्रायल शुरू कर दिया है। यह कदम केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक है।
उच्च गुणवत्ता: कनाडा से आने वाले इस अयस्क में लोहे की मात्रा लगभग 64% है, जो वैश्विक स्तर पर सर्वोत्तम श्रेणी में आता है।
रणनीतिक परीक्षण: कंपनी यह जांचना चाहती है कि यदि घरेलू सप्लाई चेन में कोई बाधा आती है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लॉजिस्टिक और लागत की दृष्टि से यह विकल्प कितना कारगर होगा।
बढ़ती मांग और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य
वर्तमान में टाटा स्टील अपनी भारतीय खदानों से प्रति वर्ष लगभग 4 करोड़ टन आयरन ओर निकालती है, जिससे वह कच्चे माल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है। हालांकि, कंपनी अपने प्लांट की क्षमता का लगातार विस्तार कर रही है।
अनुमान है कि वर्ष 2031 तक कंपनी की जरूरत बढ़कर 4.7 करोड़ टन सालाना हो जाएगी। वर्तमान में कनाडा की खदानों की उत्पादन क्षमता 30 लाख टन है। कंपनी का लक्ष्य भविष्य में घरेलू आपूर्ति और विदेशी आयात के बीच एक ऐसा संतुलन बनाना है जिससे इस्पात उत्पादन की निरंतरता कभी प्रभावित न हो।
घरेलू मोर्चे पर भी मजबूती की तैयारी
टाटा स्टील केवल आयात के भरोसे नहीं है। कंपनी भारत के भीतर भी अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। ओडिशा स्थित गंधलपाड़ा और कालामंग जैसी नई खदानों में खनन क्षमता बढ़ाने पर तेजी से काम चल रहा है।
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