हिंदी विवाद के बीच, अनिवार्य मलयालम विधेयक पर कर्नाटक-केरल में तनातनी, कन्नड़ अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/09/article/image/cm-siddharamiya-1767906105170.jpgहिंदी विवाद के बीच, अनिवार्य मलयालम विधेयक पर कर्नाटक-केरल में तनातनी (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु/तिरुवनंतपुरम। केंद्र सरकार पर हिंदी थोपने के आरोपों के बीच दक्षिण भारत में भाषाई विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। केरल विधानसभा द्वारा पारित मलयालम भाषा विधेयक-2025 के खिलाफ कर्नाटक ने कड़ा विरोध जताया है।
यह विधेयक केरल के सभी स्कूलों में कक्षा 1 से 10 तक मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाने का प्रावधान करता है, जिसमें कासरगोड जिले के कन्नड़ माध्यम स्कूल भी शामिल हैं। कर्नाटक का कहना है कि इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों के शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों का हनन होगा।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कड़े शब्दों में पोस्ट करते हुए केरल के मुख्यमंत्री पिनराईविजयन से विधेयक वापस लेने की अपील की। उन्होंने लिखा, “भाषाई अल्पसंख्यकों के बच्चों के लिए भाषा केवल एक \“विषय\“ नहीं है, बल्कि यह उनकी पहचान, गरिमा, पहुंच और अवसर है। प्रस्तावित मलयालम भाषा विधेयक-2025 कन्नड़ माध्यम स्कूलों में भी मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाकर भाषाई स्वतंत्रता पर हमला है।“
सिद्धरमैया ने आगे कहा, “केरल को मलयालम का प्रचार करने का पूरा अधिकार है, जैसा कर्नाटक कन्नड़ के लिए करता है। लेकिन प्रचार को थोपना नहीं चाहिए। यदि यह विधेयक लागू हुआ, तो कर्नाटक संविधान प्रदत्त सभी अधिकारों का उपयोग कर इसका विरोध करेगा।“ उन्होंने कासरगोड को भावनात्मक रूप से कर्नाटक से जुड़ा बताया और वहां के लोगों को पूर्ण कन्नड़िगा करार दिया।
कर्नाटक बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (KBADA) ने भी इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई। 7 जनवरी को एक प्रतिनिधिमंडल ने केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए इसे खारिज करने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में KBADA सचिव प्रकाश वी मट्टिहल्ली सहित कई कन्नड़ प्रतिनिधि शामिल थे।
KBADA का कहना है कि कासरगोड में बड़ी संख्या में कन्नड़ भाषी रहते हैं, जहां छात्र परंपरागत रूप से कन्नड़ को प्रथम भाषा और हिंदी, संस्कृत या उर्दू को द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ते हैं। मलयालम को अनिवार्य बनाने से मौजूदा शिक्षा व्यवस्था बाधित होगी, छात्रों की शैक्षणिक प्रगति प्रभावित होगी और उच्च शिक्षा के अवसर कम होंगे। उन्होंने याद दिलाया कि 2017 में ऐसा ही एक विधेयक राष्ट्रपति द्वारा खारिज किया गया था और केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने भी केरल को भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने की सलाह दी है।
प्रतिनिधिमंडल ने कासरगोड में कन्नड़ माध्यम स्कूलों में कन्नड़ शिक्षकों की अनिवार्य नियुक्ति, सार्वजनिक स्थलों पर कन्नड़ साइनबोर्ड और सरकारी पत्राचार में कन्नड़ के उपयोग की मांग भी की। राज्यपाल ने आश्वासन दिया कि विधेयक की संवैधानिक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखकर विस्तृत समीक्षा की जाएगी और इसे रोककर विचार किया जाएगा।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब देश में तीन-भाषा फॉर्मूला और हिंदी के कथित थोपे जाने को लेकर बहस चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350A और 350B से जुड़ा है, जो भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा संरक्षण और मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का अधिकार देते हैं।
KBADA ने कहा कि वह कन्नड़ भाषियों के भाषा, संस्कृति और शिक्षा अधिकारों की रक्षा के लिए इस मुद्दे को आगे बढ़ाएगा। केरल सरकार की ओर से अभी तक इस विरोध पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के लिए लंबित है।
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