cy520520 Publish time 2026-1-8 21:56:53

टीडीएस 1100 तक, टायफाइड से हर साल 30 मौतें; हापुड़ का पानी फाइलों में शुद्ध और हकीकत में जहर

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घरों में पहुंच रहा नालों की गंदगी से संक्रमित दूषित पानी। जागरण



जागरण संवाददाता, हापुड़। पानी की गुणवत्ता की सही जांच के लिये रसायनों का परीक्षण अनिवार्य है। स्वास्थ्य विभाग बायोलाॅजिकल जांच-टीडीएस को लगातार नगर निगम के साथ मिलकर पानी के नमूने लेकर शुद्धता का दावा करता है। इससे सामान्य रूप से होने वाले रोगों की ही जानकारी हो पाती है। पेयजल की परीक्षण प्रक्रिया पर प्रस्तुत है ठाकुर डीपी आर्य-हापुड़, जितेंद्र शर्मा-पिलखुवा, पंकज कुमार- पिलखुवा, अरुण कुमार-धौलाना, रुस्तम सिंह- बाबूगढ़, सतीश शर्मा-सिंभावली, ध्रुव शर्मा-गढ़मुक्तेश्वर व अशरफ चौधरी- की रिपोर्ट...
छह वर्षों में पानी की जांच की स्थिति



   
वर्ष
   सैंपल
   फेल सैंपल


   2019
   1461
   0


   2020
   1155
   0


   2021
   337
   427


   2022
   5222
   90


   2023
   4060
   0


   2024
   5615
   0



पानी में मौजूद तत्व व उनका मानक



   तत्व
   न्यूनतम
   अधिकतम


   
कठोरता
   200
   600


   क्षारीयता
   200
   600


   क्लोराइड
   200
   1000


   आयरन
   0.1
   1.0


   फ्लोराइड
   0.0
   1.5


   सल्फेट
   200
   400


   नाइट्रेट
   45
   45


   पीएच
   7.0
   8.5


   टर्बिडिटी
   0.0
   5.0


   कलर
   0.0
   5.0





तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी हैं।।

नामचीन गजलकार अदम गोंडवी की यह पंक्तियां जिले की स्थिति पर सटीक बैठती हैं। अधिकारियों का दावा है कि जिले के सभी 1132 पेयजल नलकूपों में से मात्र एक का ही टीडीएस थोड़ा बढ़ा हुआ है। वहीं जिलेभर में कहीं पर भी पेयजल की गुणवत्ता खराब नहीं है। जिले में कहीं पर रसायन मिला पेयजल नहीं मिल रहा है। भूजल की स्थिति संतोषजनक है जबकि जिले के लोग पेयजल से होने वाली बीमारियों से परेशान हैं।

चिकित्सकों का दावा है कि लोगों को स्वच्छ पेयजल नहीं मिल रहा है। इससे कई गंभीर बीमारियां हो रही हैं। जिले में हर साल 30 से ज्यादा लोगों की मौत तो अकेले टायफाइड से ही हो जाती है। जबकि कैंसर, लीवर, हड्डी और त्वचा के रोगियों की भरमार है। जिले में इस समय में कैंसर के करीब 77 ऐसे लोग हैं, जिनकी बीमारी का कारण पेयजल को माना जा रहा है।

इससे स्पष्ट है कि अधिकारियों का स्वच्छ पेयजल का दावा फाइलों का ही है। हकीकत इसके उलट और भयावह है। लोगों के घरों में सीवर और नालों का मिला हुआ दूषित पानी पहुंच रहा है। घर तक पहुंचने वाले पानी में कई प्रकार के घातक रसायन, सीवर की गंदगी और नालों का कीचड़ होता है। दैनिक जागरण द्वारा की जा रही पड़ताल में सामने आया है कि पेयजल का टीडीएस 300 के सापेक्ष 500 से लेकर 11 सौ तक मिल रहा है। उसके बावजूद जिम्मेदार सुध लेने को तैयार नहीं हैं। सच्चाई यह है कि घरों पर पानी के सैंपल लिए ही नहीं जाते हैं। लोग जिस पानी को पी रहे हैं, उसकी गुणवत्ता से जानबूझकर आंखे चोरी की जा रही हैं।
दोनों का हाल एक जैसा

जिले में दो प्रकार की पेयजल सप्लाई है। कस्बों में जहां नगर पंचायत-पालिका द्वारा पेयजल की सप्लाई दी जाती है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में जल निगम ग्रामीण द्वारा पेयजल की पाइपलाइन सप्लाई दी जाती है। सबसे पहले कस्बों की बात करें तो हालात चिंताजनक हैं। पेयजल पाइपलाइन दशकों पहले की डाली हुई हैं। इनके पाइप क्षतिग्रस्त हो गए हैं। इनको जगह-जगह नालों के बीच से होकर निकाला गया है। नालों में इनके साथ ही सीवर लाइन भी डाली हुई हैं।

वहीं, दो तिहाई शहर का सीवर नालों में ही बहाया जा रहा है। नालों की सफाई में भी पेयजल की सप्लाई लाइन क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ऐसे में नालों व सीवर का पानी पेयजल सप्लाई में मिल जाता है। यह लोगों की रसोई तक पहुंच रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल पाइपलाइन डालने का कार्य जल निगम द्वारा किया जा रहा है। अभी तक यह अधूरा पड़ा हुआ है। दो साल से बजट ही आवंटित नहीं हुआ है। ऐसे में किसी गांव में पाइनलाइन नहीं है तो किसी में ओवरहेड टैंक ही अधूरे पड़े हैं। इससे स्वच्छ पेयजल देने का अभियान दावों से आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
जांच के नाम पर हो रहा खेल

जिले में नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फार टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज (एनएबीएल)की व्यवस्था है। यह शहर के असौड़ा में है। इसकी देखभाल जल निगम द्वारा की जाती है। यदि दावों की मानें तो हर महीने लैब पर पेयजल सप्लाई की टेस्टिंग की जाती है। वही हर साल भारत सरकार की टीम टेस्टिंग लैब की भी जांच करती है। यानि जिले में पेयजल की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप है। इसमें ही अधिकारियों द्वारा खेल किया जा रहा है।

नियमानुसार पेयजल का सैंपल उपभोक्ता प्वाइंट पर लिया जाना चाहिए। जबकि अधिकारी नलकूप से सैंपल लेकर जांच कराते हैं। ऐसे में पेयजल की वास्तविक गुणवत्ता का पता ही नहीं चलता है। यही कारण है कि जांच रिपोर्ट में टीडीएस 300 तक दिखाया जाता है, जबकि पड़ताल में इसका स्तर 11 सौ तक निकल रहा है। वहीं नालों और नदियों के आसपास के क्षेत्रों में भूजल भी दूषित है। उसे बावजूद ग्राउंड वाटर के सैंपल नहीं लिए जा रहे हैं। पानी में रसायनों की जांच हो ही नहीं रही है। ऐसे में लोगों को पानी से घातब बीमारियां हो रही हैं।


“हमारे पास जल परीक्षण की अत्याधुनिक लैब है। उसके लिए हमने एनएबीएल का प्रमाण पत्र भी लिया हुआ है। हर महीने जिलेभर से चेकिंग की जा रही हैं। कुछ क्षेत्रों में टीडीएस बढ़ा हुआ है और कठोरता जाता है। जिले में कहीं पर भी फ्लोराइड, आर्सेनिक या अन्य रसायन की उपलब्धता नहीं है।“

-विनय कुमार रावत, एक्सईएन, जल निगम।


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