LHC0088 Publish time 2026-1-8 15:57:00

पेसा नियमावली 2025 पर आपत्ति जताई, इन मुद्दों पर संशोधन की मांग को ले राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

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पेसा नियमावली 2025 पर आपत्ति दर्ज कराते हुए राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को ज्ञापन सौंपा और उसमें संशोधन की मांग की।



जागरण संवाददाता,गुमला। रूढ़िजन्य आदिवासी समन्वय समिति के प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को पेसा नियमावली 2025 पर आपत्ति दर्ज कराते हुए राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को ज्ञापन सौंपा और उसमें संशोधन की मांग की।

समिति की अगुवाई निशा उरांव ने की। प्रतिनिधियों ने कहा कि वर्तमान नियमावली पेसा अधिनियम 1996 और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की भावना के अनुरूप नहीं है।

निशा उरांव ने बताया कि नियमावली के कई प्रविधानों से यह प्रतीत होता है कि पेसा क्षेत्र को सामान्य क्षेत्र की तरह देखा जा रहा है। जबकि पेसा 1996 के अनुसार ग्राम सभा को सर्वोच्च संस्था माना गया है।

वर्तमान नियमावली में लोकतांत्रिक स्वशासन को पारंपरिक स्वशासन से ऊपर रखा जा रहा है, जबकि दोनों की भूमिका और कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं और दोनों को संतुलित रूप से अधिकार मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पेसा 1996 के तहत ग्राम सभा के गठन में रूढ़ियों और परंपराओं को प्राथमिकता दी गई है। लेकिन नई नियमावली में ग्राम सभा की मान्यता और पारंपरिक सीमा निर्धारण की पूरी जिम्मेदारी उपायुक्त को सौंप दी गई है।

इसी तरह आदिवासी भूमि से अवैध कब्जा हटाने की शक्ति भी पूर्ण रूप से उपायुक्त को दी गई है, जबकि पूर्व प्रारूप में यह अधिकार ग्राम सभा को देने का प्रस्ताव था। इससे ग्राम सभा कमजोर होती है।

मूली पड़हा गुमला के कोटवार देवेंद्र लाल उरांव ने कहा कि टोला ग्राम सभा के गठन से पारंपरिक ग्राम सभा की मजबूती प्रभावित होगी, क्योंकि उरांव जनजाति में एक राजस्व ग्राम, एक सरना और एक ग्राम सभा की परंपरा रही है।
कहा-पंचायत समिति या जिला परिषद की भूमिका बढ़ाने से पेसा कमजोर होगा

जयराम उरांव ने बताया कि पड़हा, मानकी, मांझी जैसी पारंपरिक संस्थाओं को केवल विवाद निपटारे तक सीमित कर दिया गया है। वहीं फौदा उरांव ने कहा कि विकास योजनाओं की स्वीकृति में पंचायत समिति या जिला परिषद की भूमिका बढ़ाने से पेसा कमजोर होगा और चुनावी व प्रशासनिक तंत्र हावी हो जाएगा।

गौरी किंडो ने लाभार्थियों की पहचान और लाभ वितरण में ग्राम सभा की भूमिका सीमित होने पर चिंता जताई। पूर्व प्रारूप में प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक स्वामित्व की स्पष्ट पहचान थी, लेकिन वर्तमान नियमावली इस पर मौन है।

सहमति जैसे शब्दों के प्रयोग से भविष्य में विवाद की आशंका है। प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि यह आपत्तियां गलतियां निकालने के लिए नहीं, बल्कि नियमावली को बेहतर बनाने के उद्देश्य से दी गई हैं।

राज्यपाल ने कहा कि आपत्ति पत्र सरकार को भेजा जाएगा और अंतिम निर्णय में मुख्यमंत्री की अहम भूमिका होती है, इसलिए सामाजिक अगुवा सरकार से भी संवाद करें। अगुवाओं ने बताया कि यदि संशोधन नहीं हुआ तो रूढ़िजन्य समाज और आदिवासी पारंपरिक धरोहर को गहरी क्षति पहुंच सकती है।

प्रतिनिधिमंडल में सच्चिदानंद उरांव, बिरसा उरांव, जलेश्वर उरांव, नूतन कच्छप, शिरोमणी बिलुंग, जांझी खड़िया, कृष्णा मुंडा, महेश्वर उरांव सहित अन्य पारंपरिक अगुवा मौजूद थे।
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