Sonam Wangchuk: सोनम वांगचुक पर लगे NSA को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई आज, लद्दाख में तनाव बरकरार
Sonam Wangchuk: मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तारी के मामले में आज सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो द्वारा दायर याचिका में उनकी गिरफ्तारी को \“असंवैधानिक\“ और \“दमनकारी\“ बताया गया है। बता दें कि वांगचुक को तब गिरफ्तार किया गया जब वे लद्दाख की मांगों को लेकर \“दिल्ली चलो\“ पदयात्रा का नेतृत्व कर रहे थे।\“दिल्ली चलो\“ मार्च के दौरान हुए थे गिरफ्तार
सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया था। लेह को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद यह कार्रवाई की गई। प्रशासन का आरोप है कि वांगचुक ने प्रदर्शनकारियों को उकसाया, जिससे हुई हिंसा में 4 लोगों की मौत और 90 लोग घायल हो गए थे।
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याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु
वांगचुक की पत्नी और उनके कानूनी दल ने अदालत के सामने ये तर्क रखे हैं:
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: याचिका के अनुसार, वांगचुक की हिरासत मनमानी है और यह अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार का हनन है।
अहिंसक विरोध: बचाव पक्ष का कहना है कि वांगचुक ने हमेशा गांधीवादी और अहिंसक तरीकों का समर्थन किया है, उन्हें NSA जैसे कड़े कानून के तहत रखना गलत है।
आवाज दबाने की कोशिश: याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रशासन लद्दाख की क्षेत्रीय और संवैधानिक मांगों को दबाने के लिए इस कठोर कानून का सहारा ले रहा है।
लद्दाख को लेकर आखिर विवाद क्या है?
सोनम वांगचुक लंबे समय से लद्दाख को लेकर कई प्रमुख मांगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं:
छठी अनुसूची: लद्दाख के नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को औद्योगिक शोषण से बचाने के लिए संवैधानिक सुरक्षा।
पूर्ण राज्य का दर्जा: 2019 में केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से लद्दाख के लोग स्वायत्तता और अपनी जमीन-संसाधनों पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं।
लोकतांत्रिक अधिकार: लद्दाख के लिए अलग विधानसभा और संसदीय प्रतिनिधित्व की मांग।
कोर्ट की कार्यवाही पर टिकी है सबकी नजर
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बुधवार को प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद संबंधित अधिकारियों को जवाब दाखिल करने का समय दिया था। आज की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या वांगचुक की हिरासत जारी रहेगी या उन्हें तत्काल राहत दी जाएगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला लद्दाख में नागरिक स्वतंत्रता और असहमति की आवाज के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।
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