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जस्टिस वर्मा जांच: सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार को सही ठहराया

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सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के समिति गठन को वैध बताया



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज किए जाने के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने पर न्यायाधीश जांच अधिनियम के तहत कोई रोक नहीं है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने जस्टिस वर्मा का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के इस तर्क से भी असहमति जताई कि तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपसभापति को प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार नहीं है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन के तरीके में कुछ खामियां प्रतीत होती हैं। वह इस बात की जांच करेगा कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि कार्यवाही को समाप्त करने की आवश्यकता है?

रोहतगी ने शुरू में ही लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन का विरोध करते हुए कहा कि यदि महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन एक साथ पेश किए जाते हैं, तो समिति का गठन दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट जस्टिस वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा थी, जिसमें उन्होंने न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत उनके आवास पर बरामद जले नोट के संबंध में उनके खिलाफ जांच के लिए गठित संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी।

बताते चलें, पिछले साल 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास के स्टोर रूम में आग लगी थी। वहां से बड़ी मात्रा में जले हुए नोट बरामद हुए थे। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे।

(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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