Chikheang Publish time 2026-1-6 22:56:45

हापुड़ में पेयजल बना स्लो प्वॉइजन: लोग 500-1100 टीडीएस का पानी पीने को मजबूर; कैंसर व किडनी रोगों का बढ़ा खतरा

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जागरण के अभियान में टीडीएस चेक करते स्थानीय लोग।



जागरण संवाददाता, हापुड़। \“तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी हैं।।\“ नामचीन गजलकार अदम गोंडवी की यह पंक्तियां हापुड़ की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। अधिकारियों का दावा है कि जिले के सभी 1132 पेयजल नलकूपों में से मात्र एक का ही टीडीएस थोड़ा सा बढ़ा हुआ है। वहीं, जिलेभर में कहीं पर भी पेयजल की गुणवत्ता खराब नहीं है। सभी लाेगों को साफ पानी पीने को मिल रहा है। पूरे जिले में स्वच्छ व मानक के अनुरूप पेयजल की आपूर्ति हो रही है। मगर यह दावा जिम्मेदारों की फाइलों का है। हकीकत इसके विपरीत और स्याह है। लोगों के घरों में दूषित पानी पहुंच रहा है।

घर तक पहुंचने वाले पानी में कई प्रकार के घातक रसायन, सीवर की गंदगी और नालों का कीचड़ है। पड़ताल में सामने आया कि पेयजल का टीडीएस 300 के सापेक्ष 500 से लेकर 11 सौ है। उसके बावजूद जिम्मेदार सुध लेने को तैयार नहीं हैं। हालात यह हैं कि लोगों के घरों पर पहुंचने वाले पानी के सैंपल लिए ही नहीं जाते हैं। जिससे लोग जिस पानी को पी रहे हैं, उसकी गुणवत्ता से जानबूझकर आंखे चोरी की जा रही हैं। जिम्मेदार नलकूपों से सैंपल लेकर पेयजल सप्लाई की गुणवता का दावा कर रहे हैं।

घरों में पहुंच रहे जिस पानी का रंग साफ देखकर आप सतुष्ट हैं, वह स्वच्छ नहीं है। उसमें घातक रसायन और जैव तत्व मिले हुए हैं। वह आपके परिवार में कैंसर जैसे गंभीर रोगों का कारण बन सकता है। धीरे-धीरे कब आप गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गए, पता भी नहीं चलेगा। जब तक पता चलेगा, बहुत देर हो चुकी होगी। अभी समय है जागरूक होकर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था की जाए।

ऐसे में जिम्मेदारों को फाइलों की खुशनुमा दुनिया के बाहर का आइना दिखाने के लिए दैनिक जागरण ने जिलेभर में पेयजल की पड़ताल की। इसमें सामने आया कि 60 प्रतिशत परिवार दूषित पेयजल का प्रयोग करने को मजबूर हैं। नलकूपों के आसपास के परिवारों को पेयजल साफ मिल रहा है। उससे आगे के परिवारों को जर्जर च लीकेज पेयजल-पाइपलाइन से होकर नाले-सीवर मिले पानी का प्रयोग करना पड़ रहा है।



   टीडीएस का मानक
   300


   पाया गया टीडीएस का स्तर
   500 से 1100


   गड़बड़ वाले स्थान
   50 प्रतिशत से ज्यादा


   रंग
   पीला, काला और मटमैला


   मिलावट
   रसायन, सीवर और नालों का पानी


   परेशानी
   पाचन गड़बड़ी, लीवर, पेट, त्वचा, हड्डियों और ज्वाइंट की समस्याएं। कैसर व किडनी की गंभीर बीमारियां




दैनिक जागरण की टीम ने मीनाक्षी रोड, भीमनगर, असगरपुरा, सिकंदरगेट, इंद्रगढ़ी, कोटला, अयोध्यापुरी, माता मोहल्ला, पीरबाबुद्दीन, जैन कन्या पाठशाला के पास, कलक्टरगंज, शिवपुरी, नईमंडी, पटना, आदर्शनगर, रामपुर रोड, बुलंदशहर रोड, अर्जुननगर, गढ़ रोड, दिल्ली रोड अौर मेरठ रोड पर पेयजल पाइपलाइन के आउटर प्वाइट पर लोगों के घरों में पेयजल की गुणवत्ता की जांच की। जांच में पाया गया इन कालोनियों में ज्यादातर प्वाइंट पर टीडीएस 500 से 11 सौ तक है। इस टीडीएस का पेयजल कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।
जानबूझकर सच से मुंह चुरा रहे जिम्मेदार

पेयजल की पड़ताल से आपको लग रहा होगा कि जिले का भूजल गड़बड़ हो गया है। यह हकीकत नहीं है। धौलाना-पिलखुवा व सिंभावली-गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र के कुछ हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर जिले में भूजल की गुणवत्ता अच्छी है। यही कारण है कि ज्यादातर नलकूप से पानी अच्छी गुणवत्ता का मिल रहा है। जिम्मेदार नलकूप से पानी का सैंपल लेकर जांच को भेजते हैं, जो सही मिलता है। गड़बड़ी यहां से आगे है।

दरअसल, पेयजल सप्लाई की ज्यादातर पाइपलाइन गड़बड़ हैं। इनको कई दशक पहले डाला गया था। पाइपलाइन को कई जगह नालों-नालियों के बीच से होकर निकाला गया है। शहर में सीवर की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में ज्यादातर क्षेत्रों में सीवर नालों में बहाया जा रहा है। वहीं अधिकतर क्षेत्रों में सीवर लाइन भी नालों के बीच से व पेयजल पाइपलाइन के बराबर से होकर निकल रही हैं।

ऐसे में लीकेज होने पर सीवर और नालों की गंदगी पेयजल में मिल जाती है। दरअसल पेयजल पाइपलाइन में खिंचाव ज्यादा होने से वह बाहर की गंदगी को खींच लेता है। यही सीवर और नालों की गंदगी वाला पानी लोगों के घरों तक पहुंचता है। जबकि नलकूप से लिए गए सैंपल की रिपाेर्ट देखकर जिम्मेदार खुश होते रहते हैं।
कई क्षेत्रों में फैल रहे संक्रामक रोग

रामपुर रोड पर दो गलियों में 30 से ज्यादा लोग पीलिया के शिकार हैं। गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र से हेपेटाइटिस-सी के हर महीने 200 से ज्यादा लोग पहुंच रहे हैं। धौलाना क्षेत्र के गांव सिरोधन में ही 400 से ज्यादा लोग काला पीलिया से संक्रमित हैं। पिछले साल पिलखुवा क्षेत्र के एक ही गांव में दो सप्ताह में नौ लोगों की मौत होने और दर्जनों के बीमार होने के बाद जांच में पानी की गड़बड़ी पाई गई। गढ़मुक्तेश्वर में गंगा खादर क्षेत्र के गांवाें में हर साल दर्जनों लोगों की मौत टायफाइड से हो रही है। उसके बावजूद इन मौतों का जिम्मेदार कोई नहीं ठहराया जाता। कागजी आंकड़ाें के सहारे जिम्मेदार साफ बच निकलते हैं।
सुधार की दिशा में ठोस कदम उठ सके

पिलखुवा के रजनी विहार, सद्दीकपुरा और गढ़ी जैसे इलाकों में टीडीएस अधिक दर्ज किया गया, जिससे वहां के लोगों को लंबे समय में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का खतरा बना रहता है। वहीं आर्य नगर में टीडीएस अपेक्षाकृत कम मिला, जो थोड़ी राहत की बात है। अभियान के दौरान टीम ने स्थानीय लोगों से भी बात की। लोगों ने बताया कि पानी देखने में साफ लगता है, लेकिन स्वाद और जमाव की समस्या बनी रहती है। अभियान का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि पेयजल की वास्तविक हालत को सामने लाना है, ताकि सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
टीडीएस मीटर



   पिलखुवा


   मोहल्ला
    टीडीएस


   रजनी विहार
    750


   न्यू आर्य नगर
    720


   आर्य नगर
    560


   कृष्णगंज
    680


   छिददापुरी
    880


   अशोक नगर
    665


   सद्दीकपुरा
    750


   गढ़ी
    775


   स्थान
    टीडीएस


   बक्सर
    1000


   रझैटी
    680


   सलोनी
    540


   हरौड़ा
    480


   लुहारी
    440


   धौलाना
    400 से लेकर 1100 तक


   ढिकरी
    700


   निधावली
    150 से 250 तक (ऊपरी गंग नहर के पास)


   देहरा
    300 से 500


   नगला उदयरामपुर
    700 से 1000 तक


   ककराना
    600 तक


   सपनावत
    600 तक





“हमारे यहां पेयजल की गुणवत्ता में कोई समस्या नहीं है। हमारे द्वारा कराई गई जांच के अनुसार टीडीएस भी मानक के अनुरूप है। ज्यादातर नलकूप का टीडीएस 300 के आसपास है। केवल एक नलकूप का ही 550 आ रहा है। लीकेज की सूचना पर तत्काल मरम्मत कराई जाती है। हम समय-समय पर पेयजल के सैंपल कराते हैं।“

-विकास चौहान, एई, जलकल विभाग, नगर पालिका हापुड़।

“पेयजल की स्वच्छता पाइपलाइन सप्लाई के बाद ही स्तरीय हो सकेगी। अभी ज्यादातर योजनाओं का काम अधर में लटका है। डेढ़ साल से बजट प्राप्त नहीं हुआ है। हमको पाइपलाइन सप्लाई देने के लिए 200 करोड़ रुपये की तत्काल आवश्यकता है। अभी बजट का आवंटन नहीं हो पा रहा है। जिलेभर में योजनाएं थोड़े-थोड़े कार्य को पूरा करने के अभाव में लटकी हुई है।“

-विनय रावत, एक्सईएन, जल निगम।


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