deltin33 Publish time 2026-1-6 13:26:53

आलू की फसल में लगा झुलसा रोग, किसानों की बढ़ी मुश्किलें; कृषि विभाग ने जारी की एडवाइजरी

https://www.jagranimages.com/images/2026/01/06/article/image/Potato-1767687584688.jpg



जागरण संवाददाता, समस्तीपुर। बढ़ती ठंड व घने कोहरे के बीच आलू की फसल में झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ गया है। आलू की बढ़ती लागत के बीच फसल बचाने को किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचने लगी हैं। रोग से बचाव के लिए किसानों ने खेतों में कीटनाशक दवाओं के छिड़काव के साथ हल्की सिंचाई शुरू कर दी है।

जिले के किसान नकदी फसल के रूप में सब्जियों की फसल के उत्पादन के साथ आलू की खेती करते हैं। इसमें आलू की फसल प्रमुख है, जिसे वर्ष भर परिवार खाने के लिए सुरक्षित रख शेष आलू की उपज को व्यापारियों के हाथ बेंच कर नकदी प्राप्त करते हैं।

मोहिउद्दीनगर प्रखंड अंतर्गत रासपुर पतसिया गांव निवासी किसान अजय कुमार सिंह ने कहा कि आलू की फसल के लिए पूर्व तक तो मौसम अनुकूल था, लेकिन अब रात में घने कोहरे और ठंड बढ़ने के साथ ही पाला पड़ने से आलू समेत फूल वाली फसलों पर रोग का असर दिखाई देने लगा है।

खानपुर प्रखंड के बसंतपुर गांव निवासी युवा किसान बलराम मिश्र ने बताया कि ठंड की चपेट में आने से आलू, मटर, टमाटर, गोभी, बैंगन की फसलों में झुलसा रोग का प्रकोप बढ़ गया है। फसल को रोग से बचाने के लिए फफूंदनाशक दवाओं के छिड़काव के साथ खेतों में नमी भी बनी रहने के लिए हल्की सिंचाई भी कर रहे हैं। आलू का भाव सस्ता होने से फसल की लागत नहीं निकल पा रही है। झुलसा रोग बढ़ने से फसल में काफी नुकसान हो सकता है।
रोग की पहचान कर वैज्ञानिक तरीके से करना चाहिए प्रबंधन:

मौसम में लगातार हो रहे बदलाव के कारण जिले में आलू की फसल पर रोगों और कीटों का खतरा बढ़ गया है। कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क करते हुए पौधा संरक्षण से संबंधित सामयिक सूचना जारी की है।

सहायक निदेशक (पौधा संरक्षण) राजीव कुमार रजक ने बताया कि कोहरा, कुहासा, तापमान में उतार-चढ़ाव और अधिक आर्द्रता की स्थिति बनने से आलू की फसल में झुलसा रोग के प्रकोप की आशंका बढ़ जाती है। कृषि विभाग ने इसके लिए एडवाइजरी जारी किया है। इसमें बताया कि यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई तो फसल को भारी नुकसान हो सकता है।

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि समय पर रोग की पहचान कर वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करें, ताकि आलू की उपज और गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जा सके।
अगात झुलसा रोग के लक्षण मिलते ही प्रबंधन जरूरी:

यह रोग अल्टरनेरिया सोलानी फफूंद के कारण होता है। प्रभावित पत्तियों पर भूरे रंग के गोलाकार छल्लेदार धब्बे बन जाते हैं, जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को सूखा देते हैं। यह रोग सामान्यतः जनवरी माह के दूसरे या तीसरे सप्ताह में दिखाई देने लगता है।

कृषि विभाग ने किसानों को खेत साफ-सुथरा रखने, खरपतवार हटाने और स्वस्थ बीज के प्रयोग की सलाह दी है। रोग के शुरुआती लक्षण दिखने पर जिनेब 75 डब्ल्यूपी या मैन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
पिछात झुलसा रोग का खतरा अधिक:

फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टेन्स नामक फफूंद से होने वाला पिछात झुलसा रोग 10 से 19 डिग्री सेल्सियस तापमान और अधिक नमी में तेजी से फैलता है। वर्षा या घने कोहरे की स्थिति में यह रोग बहुत तेजी से पूरी फसल को प्रभावित कर सकता है। पत्तियों के किनारे से सूखना इसका प्रमुख लक्षण है।

इससे बचाव के लिए कृषि विभाग ने सुरक्षात्मक छिड़काव करने के साथ ही 10-15 दिन के अंतराल पर मैन्कोजेब या जिनेब का छिड़काव करने की सलाह दी है। संक्रमित फसल में मेटालैक्सिल एवं मैन्कोजेब मिश्रण या कार्बेंडाजिम एवं मैन्कोजेब मिश्रण के प्रयोग की सिफारिश की गई है।
कजरा कीट से फसल को नुकसान:

कृषि विभाग के अनुसार कजरा कीट (कटवर्म) काले-भूरे रंग का मुलायम शरीर वाला कीट होता है, जो दिन में मिट्टी में छिपा रहता है और शाम व रात के समय सक्रिय होकर पौधों को जमीन की सतह से काटकर गिरा देता है। इससे पौधे नष्ट हो जाते हैं और खेत में रिक्त स्थान बन जाता है। कजरा कीट के नियंत्रण के लिए मिट्टी उपचार की सलाह दी गई है।

मेटाराइजियम एक किलोग्राम को 25 किलोग्राम सड़ी गोबर खाद में मिलाकर 10-15 दिन तक रखने के बाद खेत में बिखेरने की अनुशंसा की गई है। अधिक प्रकोप की स्थिति में क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी को 2.5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर मिट्टी की सतह पर छिड़काव या सिंचाई करने की सलाह दी गई है।
लाही (एफिड) से बढ़ता खतरा:

लाही हरे या गुलाबी रंग का सूक्ष्म कीट है, जो पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है। इसके प्रकोप से पत्तियां सिकुड़ जाती हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है। अधिक प्रकोप की स्थिति में पत्तियों पर चिपचिपा पदार्थ (हनीड्यू) जम जाता है, जिससे सूटी मोल्ड विकसित हो जाता है। यह कीट आलू लीफ रोल वायरस का वाहक भी है।

कृषि विभाग ने मित्र कीटों के संरक्षण पर जोर दिया है। आलू की बुआई से पहले कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत सीजी को 16.6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाने की सलाह दी गई है। फसल में लाही के प्रकोप पर ऑक्सीडेमेटोन मिथाइल 25 ईसी एक लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा थायमेथोक्साम 25 डब्ल्यूजी 100 ग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।
जड़ सड़न रोग की करें पहचान:

जड़ सड़न रोग के कारण जीवाणु राल्सटोनिया सोलानासियेरम है। इसके प्रकोप से पौधे प्रारंभिक अवस्था में मुरझा जाते हैं। प्रकोप होने पर दो-तीन दिन के अंदर पौधा सूख जाता है और जीवाणु जड़ से पौधे के ऊपर तक पहुंच जाते हैं। प्रभावित कंद को काटने पर उसमें बाहरी भाग में एक गोला रिंग बना रहता है और इसको काटकर दबाने पर सफेद रस निकलता है।

यह रोग कारक संक्रमित पौध अवशेषों पर मिट्टी में बना रहता है। इस जीवाणु का वर्षा भार सिंचाई जल के माध्यम से होता है। इसे खेत के कुछ ही हिस्सों में पाया जाता है। मिट्टी में इसके जीवाणु जीवंत रहते हैं। रोकथाम हेतु कैप्टन 70 प्रतिशत प्लस के साथ हेक्साकनाजोल पांच प्रतिशत डब्लूपी का दो ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ स्प्रे करना है।
Pages: [1]
View full version: आलू की फसल में लगा झुलसा रोग, किसानों की बढ़ी मुश्किलें; कृषि विभाग ने जारी की एडवाइजरी

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com