लखीसराय: खेती में ड्रोन तकनीक से बढ़ेगा मुनाफा, किसानों की लागत आएगी कमी
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/06/article/image/Drone-Technique--1767649326982.jpgसंवाद सहयोगी, लखीसराय। खेती को आधुनिक, सुरक्षित और अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में सरकार विज्ञानी खेती को बढ़ावा दे रही है। इसी क्रम में कृषि विभाग द्वारा कृषि ड्रोन छिड़काव योजना लागू की गई है, जिसके माध्यम से कम समय और कम लागत में प्रभावी छिड़काव सुनिश्चित किया जा रहा है।
ड्रोन तकनीक से कीटनाशक, खरपतवारनाशी, फफूंदनाशी के साथ-साथ तरल उर्वरक का सटीक छिड़काव किया जा रहा है। कृषि ड्रोन छिड़काव योजना के तहत जिले में इस वर्ष 1,050 एकड़ कृषि भूमि में लगी रबी फसलों पर ड्रोन के माध्यम से उर्वरक एवं कीटनाशक का छिड़काव कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
ड्रोन से छिड़काव पर प्रति एकड़ 419 रुपये की लागत निर्धारित की गई है, जिसमें किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान की सुविधा मिलेगी। इस प्रकार किसानों को प्रति एकड़ मात्र 209.50 रुपये खर्च करने होंगे। एक किसान अधिकतम 15 एकड़ भूमि में ड्रोन से छिड़काव के लिए अधिकतम दो बार इस योजना का लाभ ले सकता है।
इस योजना से किसानों की उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है। योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को कृषि विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। अब तक जिले के 29 किसानों ने लगभग 250 एकड़ भूमि में ड्रोन से छिड़काव कराने के लिए आवेदन किया है, जिनमें सूर्यगढ़ा और बड़हिया प्रखंड के किसानों की संख्या अधिक है।
ड्रोन से छिड़काव करने पर पारंपरिक तरीकों की तुलना में 50 से 60 गुना तेजी से कार्य होता है। जहां पहले फसलों के छिड़काव में घंटों लगते थे, वहीं ड्रोन से मात्र 15 से 20 मिनट में यह कार्य पूरा हो जाता है। इससे समय की बचत के साथ मजदूरी एवं अन्य खर्च में भी कमी आती है।
ड्रोन तकनीक के उपयोग से 90 प्रतिशत तक पानी तथा लगभग 40 प्रतिशत उर्वरक और कीटनाशक की बचत होती है। साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और फसलों में रसायनों का अवशेष भी कम होता है। ड्रोन के माध्यम से नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, एनपीके एवं अन्य पोषक तत्वों का समान और सटीक छिड़काव संभव है, जिससे फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होगी।
ड्रोन के उपयोग से फसलों में समान रूप से छिड़काव संभव होगा, जिससे कीट नियंत्रण अधिक प्रभावी होगा और फसल की उत्पादकता में वृद्धि होगी। साथ ही मानव श्रम, समय और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी कम होंगे। -अंकित आनंद, सहायक निदेशक, पौधा संरक्षण, लखीसराय
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